किसी ने सच ही कहा है कि ये देखने वाले की आंखों पर होता है कि वो किस निगाह, किस मानसिकता से किसी को देखता है...
इसी सिलसिले में सती अनुसुईया की कहानी का जिक्र करना चाहता हूं...एक बार किसी सद्पुरुष का प्रवचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था...
वहीं सुनी थी ये कथा...पता नहीं कितनी याद रही है...
अगर कुछ गलत हो तो जिन्हें ठीक से पता हो, सुधार दीजिएगा...
अत्री महाराज के लिए सती अनुसुईया का पत्नी धर्म कितना महान था कि नारद जी ने उसकी कीर्ति देवलोक में भी पहुंचा दी...सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती के लिए ये सुनना बड़ा कष्टप्रद था...
हठ कर उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अनुसुईया का इम्तिहान लेने भेज दिया...
तीनों साधु का वेश बनाकर अनुसुईया के द्वार पहुंच गए...अतिथि और साधु का सत्कार धर्म जानकर अनुसुईया ने तीनों से भोजन का आग्रह किया...लेकिन तीनों तो इम्तिहान लेने की ठाने थे...तीनों ने कहा कि भोजन हम इसी शर्त पर करेंगे, अगर तुम नग्न होकर हमें भोजन कराओगी...
वाकई सती अनुसुईया के लिए ये धर्मसंकट वाली स्थिति थी...
साधुओं को भोजन नहीं कराती तो अतिथि धर्म का पालन नहीं होगा...
लेकिन जो शर्त है वो पतिव्रता स्त्री के लिए पूरी करना किसी स्थिति में संभव नहीं...
फिर पूरे मनोयोग से सती अनुसुईया ने इस धर्मसंकट से निकलने के लिए प्रार्थना की...
इस प्रार्थना ने ही सती अनुसुईया को वो शक्ति दी कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश को छह-छह माह के बालक बना दिया...तीनों को पालने में लिटा दिया...तीनों शिशु की तरह ही पैर पटकने लगे...
अब मां अगर शिशु को दूध पिलाती है तो सृष्टि चलती है...
अब अपने नवजात शिशुओं से लज्जा का सवाल ही कहां...